Friday, 23 October 2026
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Muskan Ki Beti 6 Sal Ki Hogi , Tabhi Di Jayegi Fasi? DCG Criminal KK Chaube Ne Samjhaya Pura Kanun

Muskan Ki Beti 6 Sal Ki Hogi , Tabhi Di Jayegi Fasi? DCG Criminal KK Chaube Ne Samjhaya Pura Kanun

मेरठ के चर्चित नीले ड्रम हत्याकांड में कोर्ट ने आरोपी पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को फांसी की सजा सुनाई है. अब इस मामले में सोशल मीडिया पर एक और बहस छिड़ गई है. दावा किया जा रही है कि मुस्कान की एक साल की बेटी जब तक 6 साल की नहीं हो जाती है, उसको फांसी की सजा नहीं दी जा सकती है. हालांकि इस तरह के दावे पूरी तरह से भ्रामक है और इनमें कोई सच्चाई नहीं है.


अब इस कानूनी मामले में मेरठ के डीजीसी क्रिमिनल केके चौबे ने यूपी तक से खास बातचीत की है. यूपी तक को जानकारी देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है कि कानून में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि बच्ची के 6 साल का होने तक फांसी की सजा पर रोक लग जाए, हालांकि मुस्कान के पास अभी ऊपरी अदालतों में अपील करने के कई कानूनी विकल्प मौजूद हैं.क्या है 6 साल वाला नियम
डीजीसी क्रिमिनल केके चौबे ने यूपी तक को बताया कि लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि अगर महिला के साथ छोटी बच्ची है, तो उसे 6 साल तक फांसी नहीं हो सकती है. उन्होंने साफ किया है कि यह कानून जरूर है कि बच्ची अपनी मां के साथ जेल में 6 साल की उम्र तक रह सकती है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इससे फांसी की सजा टल जाएगी.
सजा पर रोक की बात गलत
डीजीसी क्रिमिनल केके चौबे के मुताबिक अगर तमाम कानूनी प्रक्रियाएं पूरी हो जाती हैं और यह तय हो जाता है कि फांसी होनी ही है, तो कोर्ट 6 साल से पहले भी मृत्युदंड का आदेश दे सकती है. बच्ची के 6 साल के होने तक फांसी की सजा पर अपने आप रोक लग जाने की बात पूरी तरह से गलत है. इसमें कानून की तरफ से कोई बाध्यता नहीं है.
मुस्कान के पास बचे कानूनी विकल्प
निचली अदालत से मौत की सजा मिलने के बाद भी मुस्कान के लिए कानूनी रास्ते अभी पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं. केके चौबे ने बताया कि हमारी वैधानिक व्यवस्था में अभियुक्त को यह अधिकार मिला हुआ है कि वह जिले स्तर की अदालत की सजा के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपनी अपील कर सकता है.
हाईकोर्ट से राष्ट्रपति तक का रास्ता
यूपी तक से बातचीत में वकील ने बताया कि मुस्कान अब इस फैसले के खिलाफ सबसे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है. अगर वहां से भी राहत नहीं मिलती है, तो वह सुप्रीम कोर्ट जा सकती है. इसके बाद भी अंतिम विकल्प के रूप में देश के राष्ट्रपति के सामने दया याचिका दाखिल की जा सकती है.

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